Friday, 22 August, 2008

कुछ संजीदा हुआ जाए..............


ज़िन्दगी की किताब में ,आधे ख्वाब हैं कुछ फ़साने ,
चंद वरक अभी हैं 'अनीस',चलो इक ग़ज़ल लिखा जाए.
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आने वाली ग़ज़ल........ "अनीस"

Saturday, 16 August, 2008

सब कुछ करीने से........




हमेशा, ज़िन्दगी में क्यूँ नहीं होता सब करीने से
ज़िन्दगी हमेशा करीने से क्यूँ नहीं होती,

कुछ सुलझती हुई उलझने, फ़िर कुछ उलझती हुई सुलझने

लगता है अंधेरे का निकल गया है अब बल
फ़िर नज़र आता है रौशनी का छल,

आखों में है खवाब रेत के महलों के, और मुट्ठी में है रेत फिसलती हुई
कभी लगता है हौसला कम है, तो कभी वक्त कम,

जिस सूरज से सबक लेकर जागा था सुबह
कदम बढाये, उसे डूबता पीछे पाया है,

कहीं अकेलेपन से जंग,तो कहीं रिश्तों के बेमानी होने का गम
कुछ उम्मीदें कुछ ख्वाइशें, चलता रहा हरदम,
रास्ते देते हैं दगा,मंजिल है उनकी पुरानी दुश्मन

कुछ अनछुई खुशियाँ,कुछ अधूरी रातें
कभी कुछ करने के लिए जीना,कभी जीने के लिए करना कुछ काम,

ज़िन्दगी क्या है,बस दो घटा दो, सब बराबर,

कहने को तो ये अपनी है,पर कहाँ मिलता है इसमें अपनी मर्ज़ी का सब कुछ,
जो मिला अच्छा सब उसका*,जो हुआ बुरा वो सब हमारे करम,

सब कुछ बिखरा हुआ ,सारा अस्त-व्यस्त,

ये ज़िन्दगी,हमेशा करीने से क्यूँ नहीं होती!!!!

*खुदा का
अनीस


Friday, 15 August, 2008

आकर्षण


ऐसा सृष्टि के जन्म से ही हो रहा है निरंतर,
अनगिनत पुरूष समा जाते हैं गर्त में,
सिर्फ़,स्त्री उपभोग की लालसा लिए,


क्या ये इतना अधिक आनंदमयी है,
जो तोड़ देता है,समस्त आचारों के बंधन?

नहीं, मैं समझता हूँ,
ओठों, उभारों और कटिप्रदेशों के दोहन से,
कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उसी छुअन,
उसे गहरे से हर बार देखने को करता मन,
जो प्रत्येक काया में करता है,
नित नया रूप धारण,

और यही है,सिर्फ़ यही है,
स्त्री देह की अभिलाषा का आकर्षण!


अनीस